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Friday, 16 December 2016

नहाने का वैज्ञानिक तरीका

नहाने का वैज्ञानिक तरीका
        अपने स्वस्थ एवं सुरक्षित जीवन के लिये इस पोस्ट को अवश्य पढे और पढ़ायें.
     क्या आपने कभी अपने आस पास ध्यान से देखा या सुना है कि नहाते समय बुजुर्ग को लकवा लग गया? दिमाग की नस फट गई ( ब्रेन हेमरेज), हार्ट अटैक आ गया । छोटे बच्चे को नहलाते समय वो बहुत कांपता रहता है, डरता है और माता समझती है की नहाने से डर रहा है, लेकिन ऐसा नहीँ है; असल मे ये सब गलत तरीके से नहाने से होता है ।
      दरअसल हमारे शरीर में गुप्त विद्युत् शक्ति रुधिर (खून) के निरंतर प्रवाह के कारण पैदा होते रहती है, जिसकी स्वास्थ्यवर्धक प्राकृतिक दिशा ऊपर से आरम्भ होकर नीचे पैरो की तरफ आती है। सर में बहुत महीन रक्त् नालिकाये होती है जो दिमाग को रक्त पहुँचाती है। यदि कोई व्यक्ति निरंतर सीधे सर में ठंडा पानी डालकर नहाता है तो ये नलिकाएं सिकुड़ने या रक्त के थक्के जमने लग जाते हैं।और जब शरीर इनको सहन नहीं कर पाता तो ऊपर लिखी घटनाएं वर्षो बीतने के बाद बुजुर्गो के साथ होती है। सर पर सीधे पानी डालने से हमारा सर ठंडा होने लगता है, जिससे हृदय को सिर की तरफ ज्यादा तेजी से रक्त भेजना पड़ता है, जिससे या तो बुजुर्ग में हार्ट अटैक या दिमाग की नस फटने की अवस्था हो सकती है। ठीक इसी तरह बच्चे का नियंत्रण तंत्र भी तुरंत प्रतिक्रिया देता है जिससे बच्चे के काम्पने से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है , और माँ समझती है की बच्चा डर रहा है । गलत तरीके से नहाने से बच्चे की हृदय की धड़कन अत्यधिक बढ़ जाती है स्वयं परीक्षण करिये।
हम आपको नहाने का सबसे सही तरीका बताते है।
       बाथरूम में आराम से बैठकर या खड़े होकर सबसे पहले पैर के पंजो पर पानी डालिये, रगड़िये, फिर पिंडलियों पर, फिर घुटनो पर, फिर जांघो पर पानी डालिये और हाथों से मालिश करिये।फिर हाथो से पानी लेकर पेट को रगड़िये । फिर कंधो पर पानी डालिये, फिर अंजुली में पानी लेकर मुँह पर मलिए । हाथों से पानी लेकर सर पर मलिए।इसके बाद आप शावर के नीचे खड़े होकर या बाल्टी सर पर उड़ेलकर नहा सकते है।
       इस प्रक्रिया में केवल 1 मिनट लगता है लेकिन इससे आपके जीवन की रक्षा होती है। और इस 1 मिनट में शरीर की विद्युत प्राकृतिक दिशा में ऊपर से नीचे ही बहती रहती है क्योंकि विद्युत् को आकर्षित करने वाला पानी सबसे पहले पैरो पर डाला गया है।
      बच्चे को इसी तरीके से नहलाने पर वो बिलकुल कांपता डरता नहीं है। इस प्रक्रिया में शरीर की गर्मी पेशाब के रास्ते बाहर आ जाती है आप कितनी भी सर्दी में नहाये कभी जुखाम बुखार नहीं होगा।
कृपया इस पोस्ट को आगे भेजें ,यह छोटे बच्चों ,बुज़ुर्गों के लिये बहुत उपयोगी है ।

Tuesday, 29 November 2016

जमीन पर बैठकर खाना खाने के होते हैं कई स्वास्थ्य लाभ

जमीन पर बैठकर खाना खाने के होते हैं कई स्वास्थ्य लाभ
          समय के साथ साथ हमारी आदतों और जीवनशैली में बदलाव आता है और ये कुछ हद तक सही भी है, जमाने के साथ चलना ही प्रगति कहलाती है ! आजकल हम टेबल कुर्सी पर बैठकर खाना खाने के आदि हैं लेकिन पहले के जमाने के लोग नीचे बैठकर ही खाना खाते थे यहाँ तक की राजा महाराजा भी जमीन पर बैठकर ही खाना खाते थे ! ये सिर्फ आदतों की बात नहीं है इसके पीछे भी छुपे हैं कई अनगिनत लाभ !
       नीचे बैठकर खाने के कई लाभ होते हैं जो हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं, आइये आपको भी बताते हैं नीचे बैठकर खाना खाने के क्या क्या लाभ होते हैं शायद आप भी ये लाभ जानकर जमीन पर बैठकर खाना खाने की आदत डाल लें !
सुखासन योग
        आपने सुखासन योग के बारे में तो सूना होगा जिसे पालकी बनाकर बैठकर किया जाता है, नीचे बैठकर खाने खाते समय भी हम पालकी बनाकर बैठते है जिससे हमारा शरीर लचीला बनता है और मन शांत रहता है ! इसके अलावा जमीन पर बैठने से हमारे शरीर में तनाव ख़तम हो जाता है !
मोटापे में फायदा :
       आज के खान पान के कारण लोगों में मोटापा बढ़ने लगा है लेकिन शायद आपको ये नहीं पता होगा की अगर जमीन पर बैठकर खाना खाने की आदत डाल लें तो इससे मोटापा कम होता है !
पाचन क्रिया सही रहती है :
       जमीन पर बैठकर खाते समय हमारा शरीर आगे की तरफ झुकता है और फिर सीधी मुद्रा में आता है ऐसे में हमारे शरीर में पाचन क्रिया सही रहती है जिससे अपच की परेशानी नहीं होती !
खून का बहाव सही होता है :
      जमीन पर बैठकर खाना खाने से हमारे शरीर में खून का बहाव सही होता है जिससे पाचन क्रिया सही रहती है और हमारे शरीर में तंदुरुस्ती बनी रहती है !
परिवार में प्रेम :
     एक और जो लाभ जमीन पर बैठकर खाना खाने का होता है वो हमारे शरीर से नहीं बल्कि हमारे पारिवारिक प्रेम से जुड़ा होता है ! जमीन पर अपने परिवार के साथ बैठकर खाने से परिवार के लोगों में आपसी प्यार बढ़ता है !

Wednesday, 12 October 2016

आपके नाखूनों के निचले हिस्से में हैं ऐसे निशान, तो जरूर पढ़ें ये पोस्ट

आपके नाखूनों के निचले हिस्से में हैं ऐसे निशान, तो जरूर पढ़ें ये पोस्ट
  
        हाथों की लकीरों को आप के भविष्य का दर्पन माना जाता है. हाथों की लकीर देख कर हस्त रेखा विशेषज्ञों को भविष्य की होने वाले घटनाओं कि तरफ़ इशारा करते हुये आप ने बहुत बार देखा होगा. सिर्फ़ हाथों की लकीरें ही नहीं, अनेको राज़ आपकी हथेली पर भी छिपे होते हैं। जैसे हाथों की उंगलियों के आकार से आप के स्वभाव के बारे मैं पता चलता है, वैसे ही उंगलियों के नाखून पर बने निशान भी काफ़ी कुछ कहते हैं .
       आधा चांद नाखून का अहम हिस्सा होता है
नाखूनों के निचले हिस्से में आधा चांद बना हुआ होता है, जो की नाखून के बाकी हिस्सों से कुछ ज़्यादा सफ़ेद होता हैं। क्या आपने कभी सोचा है , आखिर ये आधा चांद क्यों बना हुआ होता है? वास्तविकता ये है कि ये आधा चांद नाखून का अहम हिस्सा होता है। इस आधे चांद वाले हिस्से को लाटिन भाषा में “Lunula” कहते हैं । हिंदी में इसे छोटा चांद कहते है। ये Lunula सिर्फ़ डिज़ाइन नहीं , Lunula आपके स्वास्थ्य के विषय मैं काफ़ी राज़ खोलता है।
चीन के पारम्परिक स्वास्थ्य समुदाय का मानना है की Lunula किसि व्यक्ती के स्वास्थ्य का मापदंड होता है। ये आधे चांद की स्थिति आपके स्वास्थ्य का बेरोमिटर होता है। आप जब पुर्ण रूप से स्वस्थ नहीं होते हैं तो Lunula आप के नाखूनों से गायब हो जाता है स्वास्थ्य जब सही नहीं चल रहा होता या व्यक्ती बीमार होता है तो उस स्थिती मैं ये लगभग नाखून से गायब हो जाते हैं एवं स्वास्थ सही होने पर ये पुन: प्रकट हो जाते हैं
आधे चांद क्या कहते हैंआपके स्वास्थ्य के बारे में?
१. सामान्य आधा चांद (Lunula)
     अगर आप की १० उंगलियों के नाखूनों में से ८ उंगलियों के नाखुनों पर दूधिया सफ़ेद रंग का आधा चांद बना हुआ है तो आप क स्वास्थ्य बेहतर है ये समझा जा सकता है । तब आप को स्वास्थ्य के चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।
२. कम हो रहे आधा चांद (Lunula)
   आपकी उंगलियों के नाखूनों में से अगर आधा चांद गायब होता जा रहा है य सिर्फ़ अंगूठे में ही आधा चांद बचा हुआ है तो, तो अपने स्वास्थ्य के प्रति आपको बेहद सजग होने की ज़रूरत है और आप का स्वास्थ्य जल्दी हि गिरने वाली है और आप बीमार पड़ने वाले हैं।
        स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है की ये अर्ध चंद्र आपके शरीर से जुड़े कई प्रकार अन्य बातों की और भी इशारा करते हैं। इस के साथ ही अर्ध चंद्र के गायब होने से आपके शरीर में लोहे की कमी, थाएरॉएड एवं अन्य बिमारियां हो सकती हैं।
     इसिलिये अर्ध चंद्र पर लगातार नज़र गड़ाए रखना ज़रूरी है, क्यों की ये आप के स्वास्थ्य के सुचक होते हैं

Sunday, 9 October 2016

Method for Making Aloevera soap

Method for Making Aloevera soap:-
Aloevera skin mate khubaj upayogi se. Jeno sabu banavavaa ni rit ekdam saral se

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Ek Shikshake banavyo evo daru jene pivathi police pan tamane nahi roke by ABPAsmita News

Ek Shikshake banavyo evo daru jene pivathi police pan tamane nahi roke by ABPAsmita News
- su name se?
- kyana shikshak se te?
- keva prakaar no se te daru -
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Saturday, 10 September 2016

शरीर के पंचतत्व और इस में गडबडि आने से होने वाली तकलीफे।

 
शरीर के पंचतत्व और इस में गडबडि आने से होने वाली तकलीफे।
    
         आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर पाँच तत्वों से बना है । इस पंचतत्व में पृथ्वी, जल , अग्नि , वायु , आकाश का समावेश होता है ।मूल रुप से ये सब मूल तत्व अपनी मात्रा में बराबर रहने चहिए । इसे 'शारीरिक संगठन '
(metabolism) कहते है । जब उसमे गडबडि होती है , या किसी एक तत्व में त्रुटि आजाने अथवा व्रुध्धी हो जाने से दूसरे तत्वों में गडबडि आती है , तो उसके कारण रोगों कि उत्पति होती है ।
1 पृथ्वी(earth):
इस तत्व से शरीर के सभी जैविक बल निष्क्रिय एवं अचेतन बन जाते है । अत: उन सबको सक्रिय रखने के लिए अधिक शक्त्ति कि ज़रूरत पडती है । अधिक वजनवाले , मांसल , चरबीयुक्त व्यक्ति इस तत्व के आधिपत्य के उदाहरण है । ऐसे लोग निशिँत होते है । उनमें कुछ प्राप्त करने कि उत्सुकता नही रहती । वे संघर्ष से दूर भागते है । उनका जीवन सुस्त (मंद ) रहता है ।जब शरीर में यह तत्व त्रुतिपुर्ण रहता है ,तब ऐसे लोग स्वार्थी बनते है और स्वार्थयुक्त आनंद लेते है ।यह तटस्थ तत्व है ।
2 जल (water):
यह शरीर एवं जीवन प्रवाह को सुरक्षित रखता है ।शीतलता इस का स्वभाव है । शरीर में 70 प्रतिशत से अधिक पानी रहता है ।अत: शरीर के तापमान को बनाए रखने तथा रुधिर आदि कि कार्य पध्दति में इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है । यह ऋण तत्व है ।
3 अग्नि (fire )
यह शरीर में अग्नि उत्पन्न कर जल को उष्णता प्रदान करता है । यह दृष्टि का नियंत्रण करता है । आहार का पाचन कर शरीर को शक्ति प्रदान करता है । भूख और प्यास को प्रेरित करता है । स्नायुओ का स्थितिस्थापकता बनाए रखता है एवं चेहरे को सुन्दरता प्रदान करता है । यह विचार शक्ति का सहायक बनता है । मस्तिष्क कि भेद अंतर परखनेवाली शक्ति सरल बनाता है तथा रोग प्रतिकार तत्व उत्पन्न करने में मदद करता है । यह हमारे शरीर रूपी गाड़ी कि स्टार्टर है । इस तत्व में कमी या त्रुटि आने पर एनीमिया , पीलिया , पाचन आदि से संबंधित तकलीफें होती है । यह बेहोशी , मस्तिष्क संबंधी अव्यवस्था , तनाव , दृष्टि-शक्ति कि कमजोरी , मोतिया बिंदु , एसिडिटी आदि तकलीफें उत्पन्न करता है । यह त्वचा संबंधी तकलीफें तथा रंगतत्व कि कमी उत्पन्न करता है । इसी लिए पुर्वीय चिकित्सा पद्धतियों में अग्नि तत्व कि हिफाजत व नियंत्रण को विशेष महत्व दिया गया है । यह धन तत्व है ।
4 वायु (air):
यह तत्व ही जीवन है । यह एक शक्ति है और शरीर के प्रत्येक भाग का संचालन करता है । यह हृदय कि क्रिया रुधिराभिसरण को नियंत्रण करता है और शारीरिक संतुलन बनाए रखता है । यह श्वसन एवं मल मूत्र कि गति में मदद करता है । यह आवाज उत्पन्न करता है । मानसिक शक्ति तथा स्मरण शक्ति कि क्षमता व नजाकत को पोषण प्रदान करता है । अपने आप गति करने में असमर्थ पित्तरस और कफ को यह गति देता है । यह धन तत्व है ।
5 आकाश (sky)
शरीर में हवा का वहन होता है और वह आवश्यक संतुलन बनाए रखता है।  इसलिए शरीर में पोल भी होनी ही चहिए । यदि यह वहन या भ्रमण बंद हो जाए या इसमें रुकावट आ जाए ,तो शरीर में पीडा होती है । जिसकी परिणति हार्ट अटैक , लकवा , मूर्छा आदि में हो सकती है । यह ऋण तत्व है ।

Wednesday, 7 September 2016

बच्चा समय पर खाना नहीं खाता तो ये नियम अपनाएं

 

       आयुर्वेद के अनुसार खाना बनने के बाद 48 मिनट के अन्दर खाना चाहिए, तो जो बच्चे सुबह स्कूल को जाते है और शाम को वापस घर लौटते है, उनका क्या ?
उत्तर: इसके लिए में एक विकल्प बताता हूँ, जो बच्चे सुबह-सुबह स्कूल को जाते है उनके लिए ये सूत्रा कैसे अप्लाई होगा । मेरी विनंती है कि बच्चों को खाना खिला के स्कूल भेजिए । आप बोलेंगे जी, खाते नहीं है । मै आपको इसका तरीका बताता हूँ कि वो खाना कैसे खायेंगे । हमारे शारीर की अपनी एक साइकल है । साइकल ये है कि कोई भी खाना खाए तो आपको आँठ घंटे के बाद ही भूख लगेगी । ये शरीर का अपना नियम है, जो  बच्चों के लिए, पुरुषों के लिए, सबके लिए है ।
       तो खाना खाने के आँठ घंटे बाद ही भूख लगेगी, रात का खाना उनको उस समय खिला दीजिये जो सुबह तक अंत घंटे पूरे हो जाए। मतलब कि अगले दिन शाम को ही खाना खिला दीजिये । रात को मत खिलाइए । शाम को 6 बजे तक अगर आपने खाना खिला दिया तो 8-9 बजे तक उनको नींद आ ही जाएगी क्योंकि खाना खाने के डेढ़ घंटे बाद जैसे ही खाना पच के रस में बदलता है, शरीर का ब्लड-प्रेशर अपने आप बढ़ाना शुरू कर देता है, और ब्लडप्रेशर बढे तो नींद आनी ही है, रुक नही पाएँगे आप। तो शाम का खाना 6 बजे खिला दीजिये, आँठ बजे उनको नींद आ जाएगी। 6 बजे से आँठ घंटा गिनेंगे तो सुबह चार-पाँच बजे तक वो पूरा हो जायेगा । चार-पाँच बजे के आस-पास जब वो सो कर उठेंगे तब इतनी तेज भूख लगी होगी और  आप रोटी, दाल, चावल जो खिला दोगे वो वही खाके चले जाएँगे ।
       आप को थोडा बदल ये करना है की, रात को हम 10 बजे बच्चों को खाना खिला रहे है, या 11 बजे खिला रहे है, उसके 2 घंटे बाद रस बन रहा है, तो 3-4 बजे तक आधा खाना पचा, आधा नहीं पचा, तो उन्हें उठने पर भूख नहीं लगेगी|  तो आप शाम का खाना जल्दी खाने लगे। जैसे जैन धर्म के अनुयायी पालन करते है। बच्चों को रात का खाना बिलकुल बंद कर दीजिये, मै आपको विनम्रतापूर्वक कह रहाँ हूँ । 
       रात का खाना बिलकुल बंद कर दीजिये क्योंकि, बागवट जी का ये पहला सूत्र है, सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श.. हर समय खाना  बनाते समय, खाते समय, पीते समय, रहना ही चाहिए । 6 बजे के बाद तो सूर्य प्रकाश रह नहीं सकता, और आप जानते है, सूर्यप्रकाश का सबसे बड़ा परिणाम विटामिन ‘डी’ का निर्माण, इसलिए सूर्य का प्रकाश जब तक है तो खाना खाए तो विटामिन डी । इसलिए बच्चों को तो रात का खाना बिलकुल बंद कर दीजिये ।           सुबह 7 बजे जब स्कूल जायेंगे, तो खूब भूख लगी होगी,  सांत बजे पराठा बना के खिलाइए, आलू का भी पराठा बना के खिलाइए गोभी का भी बना के खिलाइए तो भी कोई पफरक नहीं पड़ता । इस पर मै आगे बात करूँगा, सुबह का भोजन जितना हैवी हो उतना अच्छा । तो बच्चों को भरपेट खाना खिला के स्कूल में भेजिए, लंच बॉक्स की जरुरत नही है, दोपहर को आते ही खाना खिलाइए और शाम को दूसरा भोजन, रात का भोजन बंद किया तो सुबह उठाते ही भूख लगती है। तो रात का भोजन बंद करे। ये तो प्रकृति का नियम है ।                सारे जानवर, सारे पक्षी उठाते ही खाना खाते है आप देखिये, चिड़िया है सुबह-सुबह खाना खाने लगेगी, गाय, बैल भैंस, क्योंकि वो शाम को सूर्य के बाद खाना नहीं खाते,गाय रात को खाना नहीं खाती, खिला के देखो ! जर्सी गाय को छोड़कर ! जर्सी भारत की नहीं है इसलिए उसको भारत का पता नहीं है, वो रात को 2 बजे भी खा लेगी । भारत की कोई भी गाय, भारत के नस्ल की गाय 6 बजे के बाद खाना नहीं खाएगी, तो भारत के तासीर को ध्यान में रखकर भोजन जल्दी करिए, सुबह भरपूर भूख लगेगी । और निवेदन इतना ही करता हूँ कि खाली पेट तो कभी बच्चों को स्कूल मत भेजिए । आप ने कहाँ कि दूध पीकर गया है, मतलब खाली पेट ही स्कूल गया है क्योंकि दूध सॉलिड भोजन नहीं है । ऐसा भोजन सुबह शरीर में जाना बहुत ही आवश्यक है, अगर भविष्य में आप उसको एसीडिटी, अल्सर, सेप्टिक अल्सर से बचाना चाहते है तो ।

Sunday, 4 September 2016

जानिए सोते समय किस दिशा में सिर और पैर रखने चाहिए ?

 
        अक्सर हमें हमारी माँ और बुढ़े लोग हमें कहते हैं कि इस तरफ पैर करके मत सो इस दिशा में पैर करके आपको नहीं सोना चाहिए इत्यादि। हम उनसे सवाल तो बहुत पुछते हैं कि आखिर क्यों नहीं इस दिशा में पैर रखकर नहीं सोना चाहिए, या इस दिशा में ही क्यों पैर रखने चाहिए। दरअसल यह कोई अंधविश्वास नहीं है यह वैज्ञानिको द्वारा सिद्ध बात है। हम इसलिए आज इसको लिख रहे हैं क्योंकि बहुत से लोग अभी भी इस बात से अनभिज्ञ हैं।
आईये इसे विडियो के माध्यम से जानते हैं

Friday, 2 September 2016

हल्दी वाला दूध ! Cafe ने नाम दिया ‘Golden Milk’

 

        हम सब ने कभी न कभी हल्दी वाला दूध ज़रूर पिया होगा। दादी-नानी के कुछ बेहतरीन नुस्खों में से ये एक है। सर्दी-जुक़ाम हो या फ़िर ठंड की वजह से आने वाला बुखार, कुछ नहीं हो तो आपकी सेहत अच्छी रखने के लिए दादी-नानी हमें दूध में हल्दी डाल कर दे दिया करती थीं।
     लेकिन वक़्त के साथ हमारे जीवन की भाग-दौड़ ने हमारी याददाश्त को कमज़ोर कर दिया और हम ऐसे घरेलू नुस्खे भूल गए। लेकिन हमारे भूले हुए नुस्खों को आज विदेशी चाव से अपना रहे हैं। अमेरिका में एक Cafe ने हल्दी वाला दूध बेचना शुरू किया है। इस दूध को उस Cafe ने ‘Golden Milk’ नाम दिया है। लंदन के Cafe ने भी इस नाम का ही दूध अपने मेन्यू में शामिल किया है।
      एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में करीब एक साल के अंदर मसालों की खरीदारी में 56 प्रतिशत की तेज़ी आई है। वहां के लोग भी अब मसालों को अपने जीवन में जगह दे रहे हैं। अमेरिका में किए गए एक शोध में सामने आया था कि आयुर्वेद में लिखे मसालों का उपयोग शरीर के लिए काफ़ी लाभदायक है। इस शोध के बाद लोगों ने मसालों का उपयोग कर फ़ायदा देखा।
    आयुर्वेद हमारे देश की ही देन है। लेकिन हम अपनी कुछ बेहतरीन उपलब्धियों और अनुसंधानों को भूल कर आधुनिकत बनने की होड़ में आगे बढ़े चले जा रहे हैं। वहीं हमारे देश से ज़्यादा विकसित देश हमारी ही खोज को अपना बना रहे हैं।

RO के पानी कि हकीकत और भारतीय संस्कृति और विज्ञान पर आधारित पानी शुद्ध करने का तरीका


     दोस्तों जीवन की 3 मूल आवश्यकताओं में से 1 है जल यानि पानी | इसके बिना कोई भी प्राणी अपने प्राण नहीं बचा सकता..
      इस जल को विकासवाद ने जितना दूषित किया है उससे आज हमारे सामने समस्याओं का बिमारियों का अम्बार खड़ा हुआ है. 1 दिन भी हम जल पिए बिना नहीं रह सकते, यह सत्य है और एक दिन में ही हम कितना सारा जल पि जाते हैं.
    अगर ये कहा जाए कि जिंदगी में पानी के बिना कुछ भी संभव नहीं है, तो गलत नहीं होगा। प्यास बुझाने के अलावा, खाना बनाने जैसे तमाम काम पानी के बिना संभव नहीं हैं। कई लोगों की नजर में पानी की शुद्धता जरूरी नहीं होती। लेकिन आपकी यह सोच आपके और आपके परिवार के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। नहाने के पानी से लेकर पीने के पानी तक की शुद्धता मायने रखती है। जहां अशुद्ध पानी पीने से असं2य रोगों को निमंत्रण मिलता है, वहीं अशुद्ध पानी से त्वचा संबंधी बीमारियों को न्योता मिलता है। अगर आंकड़ों की मानें, तो पीने के पानी में 2,100 विषैले तत्व मौजूद होते हैं। ऐसे में बेहतरी इसी में है कि पानी का इस्तेमाल करने से पहले इसे पूरी तरह से शुद्ध कर लिया जाए, क्योंकि सुरक्षा में ही सावधानी है।
     लेकिन विकासवाद की अंधी दौड़ में हमने इस और ध्यान ही नहीं दिया की हम कौनसा जल पि रहे हैं, कौनसा पीना चाहिए और हमारे शरीर में जो नई बीमारियाँ हैं कहीं उनका कारण यह दूषित जल तो नहीं.
   पहला प्रशन?  हम कौनसा जल पी रहे हैं ?
R.O का पानी, किसी कम्पनी ने अपने उत्पाद बेचने के लिए बिकाऊ मीडिया के साथ मिलकर R.O. की झूठी मनगड़ंत कहानी क्या सुनाई, सारी दुनिया भेडचाल में पागल हो गयी और सबने लगवाया लिया यह सिस्टम. सब अपने आप में एक्सपर्ट बन बैठे की इतने TDS का पानी सही, इतने TDS गलत. RO ये कर देगा RO वो कर देगा. फुल बकवास..
   अरे मेरे भाई यह तो सोच लेते, की जब RO नहीं था तब क्या लोग ज्यादा बीमार थे , पिने को शुद्ध पानी नहीं मिलता था. अब कुछ मुर्ख यह तर्क देंगे की अब पानी ज्यादा गन्दा हो गया इसलिए RO की जरुरत पड़ी.. पहली बात तो मेरे महान ज्ञानियों इस बात को समझो की पानी कितना ही गन्दा हो जाए उसके लिए हमारे पास मुफ्त जी हाँ बिलकुल मुफ्त की तकनीक है तो उसे छोड़कर आप सब क्यूँ पागल बने डोल रहे हो.. और अभी भी RO से विश्वास नही टूट रहा हो तो जान लो यह सब बातें.
 
   यह भी जान लो की कल भी यह WHO था जब RO WATER को शुद्ध कहकर बिकवाया था.
  आज भी वही WHO है जो उल्टा कह रहा..
तो पहले सच बोला या अब बोला यह आप ही तय करो..
 

अब बात बोतलबंद पानी की।
    वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो बोतलबंद पानी का कारोबार खरबों में पहुंच गया है। शुद्धता और स्वच्छता के नाम पर बोतलों में भरकर बेचा जा रहा पानी भी सेहत के लिए खतरनाक है। यह बात कई अध्ययनों में उभरकर सामने आई है। इसके अलावा बोतलबंद पानी के इस्तेमाल के बाद बड़ी संख्या में बोतल कचरे में तब्दील हो रहे हैं और ये पर्यावरण के लिए गंभीर संकट खड़ा कर रहे हैं।
      अमेरिका की एक संस्था है नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल। इस संस्था ने अपने अध्ययन के आधार पर यह नतीजा निकाला है कि बोतलबंद पानी और साधारण पानी में कोई खास फर्क नहीं है। मिनरल वाटर के नाम पर बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी के बोतलों को बनाने के दौरान एक खास रसायन पैथलेट्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल बोतलों को मुलायम बनाने के लिए किया जाता है। इस रसायन का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधनों, इत्र, खिलौनों आदि के निर्माण में किया जाता है। इसकी वजह से व्यक्ति की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। बोतलबंद पानी के जरिए यह रसायन लोगों के शरीर के अंदर पहुंच रहा है।
 
     यह रसायन उस वक्त बोतल के पानी में घुलने लगता है जब बोतल सामान्य से थोड़ा अधिक तापमान पर रखा जाता है। ऐसी स्थिति में बोतल में से खतरनाक रसायन पानी में मिलते हैं और उसे खतरनाक बनाने का काम करते हैं। अध्ययनों में यह भी बताया गया है कि चलती कार में बोतलबंद पानी नहीं पीना चाहिए। क्योंकि कार में बोतल खोलने पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं काफी तेजी से होती हैं और पानी अधिक खतरनाक हो जाता है।
    बोतल बनाने में एंटीमनी नाम के रसायन का भी इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बोतलबंद पानी जितना पुराना होता जाता है उसमें एंटीमनी की मात्रा उतनी ही बढ़ती जाती है। अगर यह रसायन किसी व्यक्ति की शरीर में जाता है तो उसे जी मचलना, उल्टी और डायरिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इससे साफ है कि बोतलबंद पानी शुद्धता और स्वच्छता का दावा चाहे जितना करें लेकिन वे भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं।
     बोतलबंद पानी के खतरनाक होने की पुष्टि कैलीफोर्निया के पैसिफिक इंस्टीटयूट के एक अध्ययन से भी होती है। इस संस्थान ने अध्ययन करके यह बताया है कि 1990 से लेकर 2007 के बीच कम से कम एक सौ मौके ऐसे आए जबं बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों ने ही अपने उत्पाद को बाजार से हटा लिया। वह भी बगैर उपभोक्ताओं को सूचना दिए। कंपनियों ने ऐसा इसलिए किया कि इन मौकों पर बोतलबंद पानी प्रदूषित था।
    इसके अलावा बोतलबंद पानी तैयार करने में भारी मात्रा में जल की बर्बादी हो रही है। एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में दो लीटर सामान्य पानी खर्च होता है। यानी एक तरफ तो जल संरक्षण की बात चल रही है और दूसरी तरफ शुद्ध पेयजल तैयार करने के नाम पर पानी की बर्बादी की जा रही है। पानी की बर्बादी शुद्ध पेयजल देने वाली मशीनें भी भारी मात्रा में कर रही हैं। बोतलबंद पानी तैयार करने के नाम पर भूजल का दोहन जमकर किया जा रहा है। इसके बावजूद जो पानी तैयार हो रहा है वह स्वच्छ नहीं है।
    हम तो आपको भारतीय संस्कृति और विज्ञान पर आधारित पानी शुद्ध करने का तरीका बता रहे हैं जिसमे न मुझे आपको कोई RO बेचना न ही मुझे आपसे कोई फायदा होगा
  शुद्ध पेयजल स्वास्थ्य का मूलाधार है। बचपन में अच्छे पोषण और विकास के लिये शुद्ध पेयजल बिलकुल जरुरी है। अतिसार, दस्त, पीलिया, पोलिओ आदि अनेक रोग अशुद्ध पेयजल से फैलते है। इन रोगों से सभी को नुकसान होता है लेकिन बच्चों का कुछ ज्यादा ही नुकसान होता है। शुद्ध पेयजल से यह सारा नुकसान हम टाल सकते है और दवाओं का खर्चा भी। सामुदायिक पेयजल प्रावधान अच्छा हो तब भी घरेलू सुरक्षा बरतना जरुर है। इसके लिये अनेक पद्धती और तरीके उपलब्ध है।
हमें कौनसा जल पीना चाहिए और कैसे करें उसको शुद्ध  >>
   पुराने जमाने से चली आ रही यह तकनीक सफ़ेद सूती कपडा लीजिये (2-4 लेयर्स) जितना गन्दा पानी उसके अनुसार उस पानी को इस कपडे से छानिये, इससे आपके पानी में मोटे कण व् गंदगी समाप्त होगी. अब उस पानी को उबालिए अच्छे से (इससे उसके वायरस कीटाणु इत्यादि समाप्त हो जायेंगे) फिर सामान्य तापमान पर ठंडा होने रख दीजिये. पानी तो वैसे शुद्ध हो चूका है और बिलकुल उपयुक्त है अब पिने के लिए लेकिन आप चाहें तो इसे और अच्छा (मिनरल वाटर) बना सकते हैं. तुलसी के पत्ते पानी में डालकर रखें.  जहाँ भी तुलसी का पौधा होता है, उसके आसपास का 600 फुट का क्षेत्र उससे प्रभावित होता है, जिससे मलेरिया, प्लेग जैसे कीटाणु नष्ट हो जाते हैं. इस पानी को ताम्बे के बर्तन में भरकर रखें. इस पानी को ट्रांसपेरेंट बर्तन में धुप में रखें जिससे पानी में क्रिस्टल्स बनेंगे और पानी की गुणवत्ता बढ़ जाएगी. पानी के बर्तन में सूती कपडे में कोयला या भारतीय देसी गाय के गोबर की जली हुई राख को बांधकर रखें. कार्बन सारा गंद अपने और खिंच लेगा. क्या आप जानते हो की जो water purifier सिस्टम आपके घर में लगा हुआ है उसमे भी यही कोयले की तकनीक इस्तेमाल की जाती है ? कृपया अपनी कैंडल को तोड़कर देखिये और जानिये इस सत्य को.. अब अगर आपको शुद्ध पानी चाहिए और बिमारियों से बचना है तो यह कार्य अपने प्रतिदिन के कार्य में जोडीये और स्वस्थ रहिये..

Monday, 29 August 2016

विदेशों में नीम के दातुन को गॉड गिफ्ट मानते है ! जाने ! !

 
विदेशों में नीम के दातुन को गॉड गिफ्ट मानते है ! जाने ! !

      हम तो उस दौर से गुजर रहे है जहाँ लगभग 80 प्रतिशत बच्चे नींम का पेड़ भी नहीं पहचान सकते, मेडिकल प्रॉपर्टीज तो दूर की बात है। हमारे पूर्वज जो सिर्फ नीम का ही दातुन इस्तेमाल करते थे और वर्षो उनके दांत मजबूत और बीमारी रहित रहा करते थे। आज हम कूड़ा कचरा का उपयोग करके तरह तरह की डेन्टल प्रोब्लेम्स झेलने को मजबूर है। एक बार पुनः सोचने की जरूरत है की हमारे पूर्वज ज्यादा साइंटिफिक थे या हम है । पढ़े लिखे लोग ब्रांड नाम की बीमारी के चक्कर में मुर्ख बनते हर जगह नजर आ जायेंगे। हम भारतीय नीम के दातुन को जाने कब का भूल चुके है और अमेरिका में ऑनलाइन बिक रहा है। है न हैरानी की बात ! हम उनका कचरा पेस्ट इस्तेमाल कर रहे है और वो नीम का दातुन।
 
अमेरिका मैं नीम एक दातून की कीमत 135 रूपये

    एंटी बैक्टीरियल व एंटी फंगल तत्वों से निपटने के लिए यूरोपीय देशों में तेजी से बढ़ रही मांग । नीम को विदेशों में गॉड गिफ्ट के रूप में देखा जा रहा है। एंटी बैक्टीरियल और एंटी फंगल तत्वों की मौजूदगी इसकी खास वजह है। यही कारण है कि यूरोपीय देशों में लोग टूथपेस्ट के बजाए नीम की दातुन को कर रहे हैं। इसकी मांग लगातार बढ़ रही है अमेरिका जैसे देशों में 2 डॉलर यानी लगभग 135 रूपये की एक दातुन बिक रही है।
यूरोपीय देशों में बढ़ रही मांग
   सीबीआरआई के प्रो वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि यूरोपीय देश के लोग स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागरूक हैं। नीम पर वहा कई शोध हो चुके है। वहां के कई नागरिक सुबह दातून करते नजर आ जाएंगे।अमेरिका के शहर में तो 2 डॉलर में एक दातुन बिकते उन्होंने खुद देखी है। यूरोपीय देशों में धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ती जा रही है। वहां के मॉल में भी इसकी बिक्री शुरु हो गई है उनको एक पैकेट में पैक करके उसे शो केस में विशेष जगह दी जा रही है।
 
शरीर में नैनो रूप में पहुंचते हैं तत्व 
   डॉक्टर श्रीवास्तव ने बताया कि सुबह के वक्त जीभ सबसे अधिक संवेदनशील अवस्था में रहती है । खाली पेट जब दातुन को दांतों से कुचते हैं तब मुंह में मौजूद बैक्टीरिया तो मरते ही है साथ में वह जीब के माध्यम से सूक्ष्म रुप में शरीर के सभी हिस्सों में पहुंचती है । और बेक्टेरिया को समाप्त करती है।
एशिया रीजन की नीम में ही तत्व मिलते है:-
    डॉक्टर प्रदीप श्रीवास्तव ने बताया कि एशिया की जलवायु नीम के लिए बहुत मुफीद है। एंटी बैक्टीरियल व एंटी फंगल गुण यही की नींद में पाया जाता है । ठंड ज्यादा होने से यूरोपीय देश में नीम उगाई नहीं जा सकती। वहां के लोगों ने किसी तरह उगा भी लिया तो उस में वह तत्व नहीं मिल पाता।

Friday, 26 August 2016

किसने सिखाया दुनिया को लिखना और पढना ?

 
किसने सिखाया दुनिया को लिखना और पढना ? 

     दोस्तों जब से कंप्यूटर आया है तब से दुनिया ने कुछ वास्तविकताओ को स्वीकार करना शुरू कर दिया है जिनमे से एक है कि सबसे पहली भाषा और सबसे पहली लिपि अगर दुनिया को किसी ने दी है तो वो भारत ने दी है
      लिपि को आप सब समझते ही होंगे, जिसमे भाषा लिखी जाती है उसको लिपि कहते है जिसको हम लिखकर व्यक्त कर सकते है भाषा जो पूरी दुनिया में फैली वो संस्कृत है और लिपि जो हमने पुरे विश्व को दी है वो देवनागरी है लेकिन भारत में कई ऐसे इतिहासकार हुए है जिनका ये कहना है कि देवनागरी से पहले भी हमने एक लिपि दी है जो अब हमारी लापरवाही के कारण लुप्त हो गई है और वो है ब्रह्माणी लिपि है
        ब्राह्मणी लिपि के बारे में पूरी दुनिया के वैज्ञानिको ने जो एक बात स्वीकार की है वो ये है कि ब्रह्मणी लिपि उतनी ही पुरानी है जितना पुराना भारत है और हमारा भारत कई अरबो साल पुराना है अब समस्या ये उत्पन हो गई है कि इतनी पुरानी ब्राह्मणी लिपि को पढने और समझने वाले वैज्ञानिको की संख्या अभी नहीं है बहुत थोड़े वैज्ञानिक रहे है जो लिपि वैज्ञानिक मने जाते है जो भाषा को पढ़कर उसका अर्थ समझा सकते है और ये सब लिपि वैज्ञानिक मानते है कि अगर दुनिया को लिखना किसी ने सिखाया है तो भारत ने ही सिखाया है क्योकि भारत से पहले लिखने की कला किसी देश को नहीं आती थी| आप तभी कुछ लिख सकते है जब आपके पास लिपि होती है पढना और बोलना थोडा आसान होता है लेकिन लिखना कठिन माना जाता है जोकि लिपि के प्रभाव से ही होता है
       सबसे पहले लिखना हमें आया हमारे बाद लिखने की कला यानी लिपि भारत से चीन में गई और चीन ने हमसे लिखना सिखा| चीन में जो पिछले कुछ हजारो साल से लिपि वैज्ञानिक हुए है वो ईमानदारी से इस बात को स्वीकार करते है कि चीन के वैज्ञानिक और ऋषि मुनि भारत आये, उन्होंने लिपियों का अध्यन किया और वापिस चीन जाकर उन्होंने अपनी लिपियों का अविष्कार किया

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प्लास्टिक सर्जरी का इतिहास

 
प्लास्टिक सर्जरी का इतिहास 
     प्लास्टिक सर्जरी (Plastic Surgery) जो आज की सर्जरी की दुनिया मे आधुनिकतम विद्या है इसका अविष्कार भारत मे हुअ है| सर्जरी का अविष्कार तो हुआ हि है प्लास्टिक सर्जरी का अविष्कार भी यहाँ हि हुआ है| प्लास्टिक सर्जरी मे कहीं की त्वचा को काट के कहीं लगा देना और उसको इस तरह से लगा देना की पता हि न चले यह विद्या सबसे पहले दुनिया को भारत ने दी है|
       1780 मे दक्षिण भारत के कर्णाटक राज्य के एक बड़े भू भाग का राजा था हयदर अली| 1780-84 के बीच मे अंग्रेजों ने हयदर अली के ऊपर कई बार हमले किये और एक हमले का जिक्र एक अंग्रेज की डायरी मे से मिला है| एक अंग्रेज का नाम था कोर्नेल कूट उसने हयदर अली पर हमला किया पर युद्ध मे अंग्रेज परास्त हो गए और हयदर अली ने कोर्नेल कूट की नाक काट दी|
       कोर्नेल कूट अपनी डायरी मे लिखता है के “मैं पराजित हो गया, सैनिको ने मुझे बन्दी बना लिया, फिर मुझे हयदर अली के पास ले गए और उन्होंने मेरा नाक काट दिया|” फिर कोर्नेल कूट लिखता है के “मुझे घोडा दे दिया भागने के लिए नाक काट के हात मे दे दिया और कहा के भाग जाओ तो मैं घोड़े पे बैठ के भागा| भागते भागते मैं बेलगाँव मे आ गया, बेलगाँव मे एक वैद्य ने मुझे देखा और पूछा मेरी नाक कहाँ कट गयी? तो मैं झूट बोला के किसीने पत्थर मार दिया, तो वैद्य ने बोला के यह पत्थर मारी हुई नाक नही है यह तलवार से काटी हुई नाक है, मैं वैद्य हूँ मैं जानता हूँ| तो मैंने वैद्य से सच बोला के मेरी नाक काटी गयी है| वैद्य ने पूछा किसने काटी? मैंने बोला तुम्हारी राजा ने काटी| वैद्य ने पूछा क्यों काटी तो मैंने बोला के उनपर हमला किया इसलिए काटी|फिर वैद्य बोला के तुम यह काटी हुई नाक लेके क्या करोगे? इंग्लैंड जाओगे? तो मैंने बोला इच्छा तो नही है फिर भी जाना हि पड़ेगा|”
      यह सब सुनके वो दयालु वैद्य कहता है के मैं तुम्हारी नाक जोड़ सकता हूँ, कोर्नेल कूट को पहले विस्वास नही हुआ, फिर बोला ठेक है जोड़ दो तो वैद्य बोला तुम मेरे घर चलो| फिर वैद्य ने कोर्नेल को ले गया और उसका ऑपरेशन किया और इस ऑपरेशन का तिस पन्ने मे वर्णन है| ऑपरेशन सफलता पूर्वक संपन्न हो गया नाक उसकी जुड़ गयी, वैद्य जी ने उसको एक लेप दे दिया बनाके और कहा की यह लेप ले जाओ और रोज सुबह शाम लगाते रहना| वो लेप लेके चला गया और 15-17 दिन के बाद बिलकुल नाक उसकी जुड़ गयी और वो जहाज मे बैठ कर लन्दन चला गया|
      फिर तिन महीने बाद ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे खड़ा हो कर कोर्नेल कूट भाषण दे रहा है और सबसे पहला सवाल पूछता है सबसे के आपको लगता है के मेरी नाक कटी हुई है? तो सब अंग्रेज हैरान होक कहते है अरे नही नही तुम्हारी नाक तो कटी हुई बिलकुल नही दिखती| फिर वो कहानी सुना रहा है ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे के मैंने हयदर अली पे हमला किया था मैं उसमे हार गया उसने मेरी नाक काटी फिर भारत के एक वैद्य ने मेरी नाक जोड़ी और भारत की वैद्यों के पास इतनी बड़ी हुनर है इतना बड़ा ज्ञान है की वो काटी हुई नाक को जोड़ सकते है|
      फिर उस वैद्य जी की खोंज खबर ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे ली गयी, फिर अंग्रेजो का एक दल आया और बेलगाँव की उस वैद्य को मिला, तो उस वैद्य ने अंग्रेजो को बताया के यह काम तो भारत के लगभग हर गाँव मे होता है; मैं एकला नहीं हूँ ऐसा करने वाले हजारो लाखों लोग है| तो अंग्रेजों को हैरानी हुई के कोन सिखाता है आपको ? तो वैद्य जी कहने लगे के हमारे इसके गुरुकुल चलते है और गुरुकुलों मे सिखाया जाता है|
    फिर अंग्रेजो ने उस गुरुकुलों मे गए उहाँ उन्होंने एडमिशन लिया, विद्यार्थी के रूप मे भारती हुए और सिखा, फिर सिखने के बाद इंग्लॅण्ड मे जाके उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी शुरू की| और जिन जिन अंग्रेजों ने भारत से प्लास्टिक सर्जरी सीखी है उनकी डायरियां हैं| एक अंग्रेज अपने डायरी मे लिखता है के ‘जब मैंने पहली बार प्लास्टिक सर्जरी सीखी, जिस गुरु से सीखी वो भारत का विशेष आदमी था और वो नाइ था जाती का| माने जाती का नाइ, जाती का चर्मकार या कोई और हमारे यहाँ ज्ञान और हुनर के बड़े पंडित थे| नाइ है, चर्मकार है इस आधार पर किसी गुरुकुल मे उनका प्रवेश वर्जित नही था, जाती के आधार पर हमारे गुरुकुलों मे प्रवेश नही हुआ है, और जाती के आधार पर हमारे यहाँ शिक्षा की भी व्यवस्था नही था| वर्ण व्यवस्था के आधार पर हमारे यहाँ सबकुछ चलता रहा| तो नाइ भी सर्जन है चर्मकार भी सर्जन है| और वो अंग्रेज लिखता है के चर्मकार जादा अच्चा सर्जन इसलिए हो सकता है की उसको चमड़ा सिलना सबसे अच्छे तरीके से आता है|
    एक अंग्रेज लिख रहा है के ‘मैंने जिस गुरु से सर्जरी सीखी वो जात का नाइ था और सिखाने के बाद उन्होंने मुझसे एक ऑपरेशन करवाया और उस ऑपरेशन की वर्णन है| 1792 की बात है एक मराठा सैनिक की दोनों हात युद्ध मे कट गए है और वो उस वैद्य गुरु के पास कटे हुए हात लेके आया है जोड़ने के लिए| तो गुरु ने वो ऑपरेशन उस अंग्रेज से करवाया जो सिख रहा था, और वो ऑपरेशन उस अंग्रेज ने गुरु के साथ मिलके बहुत सफलता के साथ पूरा किया| और वो अंग्रेज जिसका नाम डॉ थॉमस क्रूसो था अपनी डायरी मे कह रहा है के “मैंने मेरे जीवन मे इतना बड़ा ज्ञान किसी गुरु से सिखा और इस गुरु ने मुझसे एक पैसा नही लिया यह मैं बिलकुल अचम्भा मानता हूँ आश्चर्य मानता हूँ|” और थॉमस क्रूसो यह सिख के गया है और फिर उसने प्लास्टिक सेर्जेरी का स्कूल खोला, और उस स्कूल मे फिर अंग्रेज सीखे है, और दुनिया मे फैलाया है| दुर्भाग्य इस बात का है के सारी दुनिया मे प्लास्टिक सेर्जेरी का उस स्कूल का तो वर्णन है लेकिन इन वैद्यो का वर्णन अभी तक नही आया विश्व ग्रन्थ मे जिन्होंने अंग्रेजो को प्लास्टिक सर्जरी सिखाई थी|

Sunday, 21 August 2016

सीपीआर से मृत व्यक्ति को किया जा सकता है जिंदा !!!

 

     सीपीआर से मृत व्यक्ति को किया जा सकता है जिंदा, सभी को सीखनी चाहिए यह तकनीक: डॉ. के.के. अग्रवाल

नई दिल्ली। महान पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद हनीफ के क्लीनिकली मौत हो जाने के छह मिनट के अंदर उन्हें दोबारा होश में लाया गया, लेकिन उम्र से जुड़ी समस्याओं की वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका। उन्हें सीपीआर के जरिए दोबारा जिंदा किया गया था। यह सीखना बहुत आसान है, कोई भी कर सकता है।
       इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के मानद महासचिव पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि 40 प्रतिशत अकस्माक कार्डियक के मामलों में सीपीआर-10 के जरिए पीड़ित को होश में लाया जा सकता है और बिजली के झटके वाली मशीन के जरिए इसे 60 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।
 
    सभी सार्वजनिक स्थानों पर यह एईडी मशीनें लगाई जानी चाहिए और बड़े स्तर पर हैंड्स ओनली सीपीआर 10 ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
 
     अलग अलग कम्पनी के  AED मशन नीचे फोटो मै है ।
 
          पिछले दो सालों में हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों सहित दिल्ली के सभी पुलिस पीसीआर वैन कर्मियों को यह ट्रेनिंग आईएमए के सहयोग से दे दी है।
अकस्मात दिल का दौरा देश में पहले नंबर का जानलेवा दौरा है जो हर साल लगभग 25 लाख लोगों की जान ले लेता है।
     दिल्ली इकनॉमिक सर्वे के मुताबिक, शहर में 150 से 250 मौतें होती हैं। इनमें से 25 से 45 मौतें अचानक होती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम सब हैंड्स ओनली सीपीआर-10 तकनीक सीखें। सीखने में बहुत आसान और सरल हैंड्स ओनली सीपीआर-10 में मुंह से मुंह में सांस देने की जरूरत नहीं होती।
       डॉ. अग्रवाल ने बताया कि हैंड्स ओनली सीपीआर-10 याद रखनी बेहद सरल है और किसी की जान बचाने में मदद कर सकती है। इसमें मुंह से मुंह में सांस देने की जरूरत नहीं होती, बशर्ते मरीज की मौत डूबने से हुई हो या वह छोटा बच्चा हो।
      हमें याद रखना है कि 10 मिनट के अंदर कम से कम 10 मिनट के लिए छाती के बीचों बीच 10 गुना 10 यानी 100 बार प्रति मिनट की रफ्तार से दबाते रहें। दबाना तभी बंद करें जब मरीज दोबारा सांस लेने लगे या एंबुलेंस आ जाए।
      ऐसे मौके पर पहले कुछ मिनट पीड़ित के लिए बेहद अहम होते हैं, क्योंकि जितना वक्त गुजरता जाएगा, उसके बचने की संभावना उतनी कम होती जाएगी। इसलिए वक्त बिल्कुल नहीं गंवाना चाहिए और अगर मरीज की नब्ज और सांस न चल रही हो तो छाती को तुरंत दबाना शुरू कर देना चाहिए।
      पहले मिनट में हैंड्स ओनली सीपीआर 10 देने से 90 प्रतिशत मरीजों की जान बचाई जा सकती है। लोगों को सब्र रखना चाहिए और छाती दबाना तब तक रोकना नहीं चाहिए, जब तक सामने वाला होश में न आ जाए।
      वे मरीज, जिन्हें हायपोथर्मिया हो या जिनके शरीर का तापमान 35 डिग्री से कम हो, उन्हें ठीक होने में घंटा भी लग सकता है। इसलिए कि जब उनका तापमान सामान्य होगा, तभी सीपीआर कारगर होगा।
      पौराणिक दस्तावेजों में इस बात के प्रमाण मिलते हैं, जब नवजात जन्म लेते ही हायपोथर्मिया से मृत घोषित कर दिए गए, लेकिन श्मशान भूमि की गर्मी से वह जीवित हो गए। छाती पर दबाव भी यही काम करता है।
      यह याद रखना जरूरी है कि हैंड्स ओनली सीपीआर-10 केवल सख्त सतह पर लेटाकर ही किया जाना चाहिए। मरीज का चेहरा छत की ओर करके फर्श पर लेटा दें। सीपीआर करने वाला घुटनों के बल बैठे, कोहनियां सीधी रखे और हाथों की कड़ी बना ले।

फ्रिज का पानी सेहत के लिए नुकसानकारक है !!

 
फ्रिज का पानी सेहत के लिए नुकसानकारक है !!
     मित्रो कितनी भी गर्मी पड़े फ्रिज का ठंडा पानी , या बर्फ मिलाया हुआ पानी कभी मत पियो

जरूर पढे बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी !!

     मित्रो पहले ये जान लीजिये आयुर्वेद के अनुसार ठंडे पानी की परिभाषा क्या है ??
शरीर का तापमान है 37 degrees Celsius ( 98.6 fahrenheit ) 27 डिग्री से नीचे का सभी पानी ठंडा है !! 10 डिग्री कम तक शरीर सहन कर सकता है !!
      तो बात ऐसी है मित्रो जब भी आप फ्रिज का ठंडा पानी पीते है तो गर्म पेट मे ठंडा पानी जाता है ! अब पेट आपका गर्म है और पानी ठंडा !! तो अंदर जाकर झगड़ा होता है या तो पेट पानी को गर्म करता है या पानी पेट को ठंडा करता है ! आप एक मिनट के लिए मान लीजिये आपने बहुत ठंडा पानी पिया है और पानी ने पेट को ठंडा कर दिया !
      पेट ठंडा होते ही हृदय ( heart ) ठंडा हो जाएगा ! क्योंकि पेट और हृदय ( heart ) का आपस मे कनेक्शन है ! हृदय ( heart ) के ठंडा होते ही मस्तिक्ष (Brain )ठंडा हो जाएगा !! क्योंकि इन दोनों का भी आपस मे कनेक्शन  है ! और मस्तिक्ष के ठंडा होते ही शरीर ठंडा हो जाएगा ! और शरीर के ठंडा होते ही आपको घर के बाहर निकालकर फेंक दिया जाएगा ! वो
सब लोग जो आपको लिपट कर प्रेम करते है वो आपको छूना भी पसंद नहीं करेंगे क्योंकि शरीर ठंडा हो गया ! और वो एक ही बात बोलेंगे जल्दी लेकर जाओ क्यों रखा हुआ है ?? अंतिम संस्कार कब है क्योंकि शरीर के ठंडा होते ही सिर्फ राम नाम सत्य होता है !
तो मित्रो ये ठंडा पानी पीने की गलती मत करिए !!
अब इस सारी बात का दूसरा पार्ट समझिए !
        जब बहुत ठंडा पानी आप पीएंगे तो पेट उस पानी को गर्म करेगा ! क्योंकि उसे आपको जिंदा रखना है ! तो ये भगवान की व्यवस्था बनाई हुई है लेकिन गर्म करने के लिए उसको ऊर्जा (energy )चाहिए ! अब ऊर्जा कहाँ से आएगी ?? ऊर्जा आएगी रक्त (blood) मे से ! तो सारे शरीर का खून पेट मे आएगा ! अब आप थोड़ी देर के लिए कल्पना करिए सारे मस्तिक्ष का खून पेट मे चला गया ! हृदय ( heart ) का खून पेट मे चला गया ! आंतों का खून पेट मे आ गया ! तो हरेक अंग को खून की कमी आएगी मस्तिक्ष को 3 मिनट अगर blood supply रुक गई या कम हो गई तो brain dead हो जायेगा , इस तरह heart को एक से डेड मिनट blood supply रुक गई तो heart dead हो जाएगा ! बाकी सभी अंग तो ऐसे ही खत्म हो जाएंगे ! इसलिए कहा गया है ठंडा पानी पीना बहुत बड़ा risk लेने के बराबर है !

अब इस सारी बात तीसरा पार्ट समझिए !
       हमारे शरीर मे दो आंत होती है छोटी आंत बड़ी आंत ( large intestine ) ! बड़ी आंत का काम है हमारे शरीर मे से मल को बाहर निकालना है जो भी हम खाते है पचने के बाद जो waste बचता है वो toilet के रूप मे बड़ी आंत द्वारा बाहर निकलता है ! बड़ी आंत देखने मे बिलकुल एक खुले पाइप की तरह होती है ! अब जैसे ही एक दम से आप ठंडा पानी पीते है तो ये बड़ी आंत एक दम से सिकुड़ के बंद हो जाती है अब बार-बार आपने ठंडा पानी पी पी कर इसे पूरा बंद कर दिया ! तो सुबह आपको स्टूल पास नहीं होगा toilet नहीं आएगी आप जोड़ लगा लगा कर पागल हो जायेंगे लेकिन पेट साफ नहीं होगा ! अर्थात आपको कब्जियत का रोग हो जाएगा और आयुर्वेद मे कब्जियत को रोगो की माता  कहते है ! सभी बीमरियों की जड़ है कब्जियत !अगर आपको कब्जियत का रोग हो गया और कुछ लंबे समय तक रहा तो एक एक करके आपको सभी बीमारियाँ आएंगी !! यूरिक acid ,कोलोस्ट्रोल ,heart blockage ,शुगर !!
इस लिए ये फ्रिज का ठंडा पानी आपके शरीर के लिए बहुत ही ज्यादा खतरनाक है मित्रो !!
     ये अमेरिका और यूरोप वाले बहुत अधिक ठंडा पानी पीते 5 -6 दिन फ्रिज मे रखकर फिर उसमे ice cube डाल-डाल कर पीते है और परिणाम क्या होता है सुबह 1 -1 घंटा toilet मे बिताते है पेट साफ ही नहीं होता !! और कभी आप उनसे पूछिये की भाई आपने अपनी toilet seat ये बैठने वाली cobet seat क्यों बनवाई है ये भारतीय style वाली क्यों नहीं बनवाई ??
 
       तो जवाब आएगा की भाई भारतीय वाली सीट पर आप 5 मिनट से ज्यादा बैठ नहीं सकते क्योंकि बैठने की जो पोजीशन है आपको 5 मिनट मे ही थका देती है और हमको घंटो घंटो बैठना है क्योंकि पेट साफ ही नहीं होता !! इसलिए कुर्सी जैसा बना लेते है और बैठे रहते है ! और तो और उनके toilet मे आपको library मिलेगी किताबे ,news paper मैगजीन सब मिलेगा ! क्योंकि घंटो घंटो बैठना है तो बिना इसके time कैसा पास हो ?? अभी toilet room तो किताब पढ़ने के लिए नहीं बना है ?? लेकिन उनकी मजबूरी है !
       अब हमारे देश के कुछ educated लोगो ने उनकी नकल कर toilet मे अखबार लेकर जाना ,किताबे लेकर जाना शुरू कर दिया है और साथ मे छोटी सी library बनाना शुरू कर दिया है !और ऐसा करके अपने आप को आधुनिक समझने लगे है !! मित्रो बिना सोचे समझे जब नकल की जाती है तो ऐसा ही होता है !! उनकी मजबूरी को हम अपना फैशन बना रहे है !
       तो मित्रो ये सारी समस्या का मूल कारण है वो है ठंडा पानी ! तो आप को कभी मत पीना है ! आपको अगर पीना है तो आप मिट्टी के घड़े का पानी पिये ! क्योंकि मिट्टी के घड़े मे रखे पानी को आप जब भी चैक करेंगे उसका तापमान 36 डिग्री 35 डिग्री 33 डिग्री के आस पास होगा ! और जैसा हमने ऊपर बताया आपके शरीर का तापमान है 37 डिग्री तो घड़े का पानी का तापमान और आपके शरीर का तापमान लगभाग बराबर बैठता है ! इसलिए सदियो पहले हमारे आयुर्वेद मे कहा गया घड़े का पानी अच्छा ! इसलिए हमारे देश मे सदियो से लोग मिट्टी के घड़े का पानी पीते आए !
मित्रो छोड़िए इन सब बातों को मूल बात ये है मिट्टी का घड़ा इस देश मे करोड़ो गरीब कुम्हारों द्वारा बनाया जाता है ! लेकिन जबसे प्रेशर कुकर , पलास्टिक की बोतले ,थर्माकोल के गिलास आदि आने शुरू हुये है देश के करोड़ो गरीब कुम्हारों का रोजगार छिन गया है ! बेचारा गरीब कुम्हार मिट्टी के दीपक भी नहीं बेच पता क्योंकि हम सब दीवाली के त्योहारो पर चीनी लाईट खरीदकर पहले लक्ष्मी चीन को दे देते है और दीवाली की रात पुजा करते है की लक्ष्मी हमारे घर आए !!
      मित्रो आप सब अगर दुबारा से घड़े का पानी पीना शुरू करेंगे तो गरीब कुम्हारों का घड़ा बिकेगा ! फ्रिज का ठंडा पानी नहीं पिएंगे तो आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा गरीब कुम्हारों को रोजगार मिलेगा !! सरकार के भरोसों इस देश की किसी भी समस्या का समाधान नहीं होने वाला !लेकिन इस देश की जनता अपने सतर पर बहुत सी समस्याओ का समाधान कर सकती है !! आओ हम सब मिलकर गरीब कुम्हारों के sale promoter बन जाए !
और इस पोस्ट अधिक से अधिक को share कर उनका माल बिकवाएं !

Friday, 12 August 2016

ऐसे राज जो डॉक्टर आप को नही बताते

 
  ऐसे राज जो डॉक्टर आप को नही बताते  
   
     10 राज जो डाक्‍टर जानते हैं पर बताते नहीं
आप अपने डाक्‍टर पर पूरा भरोसा करते हें और उनकी सलाह को ये सोच कर मानते हैं कि वो जो करेंगे आपके फायदे के लिए ही करेंगे। पर कुछ राज ऐसे हैं जो डाक्‍टर जानते हैं कि इनका आपको नुकसान हो सकता है पर वो आपसे अपना बिल लेते हुए आपको बताने का कोई प्रयास नहीं करते। आइये जानते हैं ऐसे ही दस राज जो जानने के बावजूद आपका डाक्‍टर आपको नहीं बताता।
(1)हर कैसर ना तो कैंसर होता है ना खतरनाक :-
-जीहां अक्‍सर कैंसर को बेहद खतरनाक बीमारी के तौर पर पेश किया जाता है और इस पर लंबे चौड़े खर्च वाला इलाज बताया जाता है। पर सच ये है कि हर कैंसर ना तो खतरनाक होता है और नाही वो वास्‍तव में कैंसर होता है। खासतौर पर ब्रेस्‍ट कैंसर के ज्‍यादातर मामलों में यही होता है। जहां छोटी मोटी गांठ या फुंसी को कैंसर समझ लिया जाता है जो हो सकता है लापरवाही बरतने पर ट्यूमर बन सकती हो। लेकिन सामान्‍य रूप से बिना सर्जरी के थोड़े से इलाज से ठीक हो जाती है। वैसे भी कैंसर के अधिकतर मामलों में समय पर इलाज से उससे मुक्‍ति संभव है।
(2)जरूरी नहीं हर वैक्‍सीन :-
-बीमारियों की रोकथाम के लिए लगायी जाती हैं वैक्सीन। पर क्‍या आप जानते हैं कि इनमें से ज्‍यादातर अपना असर खो चुकी हैं। बल्‍कि कुछ तो एक अलग किस्‍म के वायरस के फैलने की वजह बन चुकी हैं। जैसे एक है फ्लू की वैक्सीन जो अपना असर खो चुकी है और अब इसका कोई फायदा नहीं। उसी तरह DTaP जो केवल बी.परट्यूसिस से लड़ने के लिए बनाई गई है जो कि बेहद ही मामूली बीमारी है। ये वैक्सीन फेफड़ों के इंफेक्शन को बढ़ाती है और दीर्घकाल में व्यक्ति की इम्यूनिटी पॉवर को कमजोर कर देती है।
(3)कफ सिरप और एंटी डिप्रेशन की दवाओं से बचें :-
-क्‍या आप जानते हैं कि आपको डायबटीज क्‍यों होता है। डायबटीज होता है शरीर में इंसुलिन की मात्रा कम कम होने से। पर क्‍या आप ये जानते हैं कि कफ सिरप और एंटी डिप्रेशन दवायें जो सामान्‍य तौर पर डाक्‍टर आपको प्रेस्‍क्राइब कर देते हैं शरीर में इंसुलिन की मात्रा घटाती हैं। आप जाने या ना जानें पर आपका डाक्‍टर इस बात को अच्‍छी तरह जानता है पर फिर भी ये दवायें आपको देता है। तो इन दवाओं के नियमित इस्‍तेमाल से बचें।
(4)कैंसर भी पैदा करती हैं दवायें :-
-जब डाक्‍टर आपको ब्‍लड प्रैशर की दवा देता है तो वो जानता है कि इनसे कैंसर हो सकता है। बीपी की दवाओं में कैल्सियम चैनल ब्लॉकर्स की तादात काफी होती है जिससे आपकी कोशिकाओं के डेड होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है और मृत कोशिकायें कैंसर की गांठ में तब्‍दील हो सकती हैं।
(5)एस्‍प्रीन हैं खतरनाक :-
-डाक्‍टरों के लिए भले ही एस्‍प्रीन प्रेस्‍क्राइब करना आम बात हो पर ये आपके अंदरूनी अंगों को कमजोर करती है और इससे अंदरूनी रक्‍त स्राव बढ़ने का खतरा सौ गुना हो जाता है। इसलिए एस्‍प्रिन का प्रयोंग कम से कम बहुत आवश्‍यक होने पर ही करें।
(6)सीने की जलन में बेहतर हैं घरेलू उपचार :-
-अक्‍सर आप खान पान, माहौल या दिनचर्या में बदलाव होने पर एसिडिटी या सीने में जलन के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में अच्‍छा होगा आप घरेलू नुस्‍खों से उपचार को महत्‍व दें बजाय इसके कि डाक्‍टर की बताई दवा लेने के। ये दवायें आंतों के अल्‍सर, हडि्डयों के क्षरण और शरीर में विटामिन बी12 को एब्जॉर्ब करने की क्षमता के कम होने की समस्‍यायें पैदा कर देती हैं।
(7)एक्‍सरे भी है खतरनाक :-
-बात पर एक्‍सरे कराने से भी बचें। डाक्‍टर हर छोटी बीमारी या दिक्‍कत पर एक्‍सरे कराने की सलाह देते हैं। लेकिन क्‍या आपको पता है कि एक बार एक्‍सरे करवाने पर उसकी रेडियो एक्‍टिव किरणों से रिकवर करने में तकरीबन एक साल लगता है। ऐसे में बार बार एक्‍सरे करवाना कितना खतरनाक हो सकता है। ये किरणे कैंसर भी पैदा कर सकती हैं। 
(8)टैस्‍ट और दवाओं के कमीशन का है लालच :-
-ये तो सभी जानते हैं कि डाक्‍टर आपको जो भी दवा लेने की सलाह अपने पर्चे पर लिख कर देता है और जो भी टैस्‍ट एडवाइज करता है हरेक के लिए उसे कमीशन मिलता है। ऐसे में वो कई बातें जो वो जानता है पर आपसे छुपा लेता है। अत डाक्‍टर पर आंख मूंद कर भरोसा करने की बजाय हर पहलू को जांच परख कर ही उसको लेने का फैसला करें।
(9)जुकाम बीमारी नहीं है :-
-याद रखें जुकाम एक सामान्‍य प्रतिक्रिया है जो कुछ परिरूथितियों के चलते आपका शरीर देता है। जिसके फलस्‍वरूप आपकी नाक की अंदरूनी त्वचा में सूजन आ जाती है जो हद से हद एक सप्‍ताह में ठीक हो जाती है। इसकी ना तो कोई दवाहै और ना ही ये कोई बीमारी है जो दवा से ठीक हो सकती है। हां इसके लिए डाक्‍टर जो एंटी बायटिक्‍स लिखते हैं उनके कई साइड इफेक्‍ट हो सकते हैं। तो जुकाम में डाक्‍टर के पास जाने से बचें।
(10)एंटी बायोटिक्‍स के और भी हैं नुकसान :-
-हल्‍के बुखार और ऐसी ही छोटी मोटी बीमारियों में डाक्‍टर के पास जाने पर वो आपको एंटीबायटिक्‍स देते हैं जो कुछ समय बाद अपने आप ही ठीक हो सकने वाली बीमारियों के लिए बहुत जरूरी नहीं है। पर आपके लीवर और किडनी को गंभीर नुकसान पंहुचा सकती हैं।

Monday, 8 August 2016

व्रत में खाने वाले साबूदाने कि हकीकत

साबूदाना एक माँसाहारी आहार है । हकीकत जानकर आपके होश उड जायेंगे !
  

   आइये देखते हैं आपके पंसदीदा साबूदाना बनाने के तरीके को।
      यह तो हम सभी जानते हैं कि साबूदाना व्रत में खाया जाने वाला एक शुद्ध खाद्य माना जाता है, पर क्या हम जानते हैं कि साबूदाना बनता कैसे है? आइए देखते हैं साबूदाने की हकीक़त को, फिर आप खुद ही निश्चय कर सकते हैं कि आखिर साबूदाना शाकाहारी है या मांसाहारी।
तमिलनाडु प्रदेश में सालेम से कोयम्बटूर जाते समय रास्ते में साबूदाने की बहुत सी फैक्ट्रियाँ पड़ती हैं, यहाँ पर फैक्ट्रियों के आस-पास भयंकर बदबू आती है ।
 

     साबूदाना विशेष प्रकार की जड़ों से बनता है। यह जड़ केरला में होती है। इन फैक्ट्रियों के मालिक साबूदाने को बहुत ज्यादा मात्रा में खरीद कर उसका गूदा बनाकर उसे 40 फीट से 25 फीट के बड़े गड्ढे में डाल देते हैं, सड़ने के लिए। महीनों तक साबूदाना वहाँ सड़ता रहता है। यह गड्ढे खुले में हैं और हजारों टन सड़ते हुए साबूदाने पर बड़ी-बड़ी लाइट्स से हजारों कीड़े मकोड़े गिरते हैं।
      फैक्ट्री के मजदूर इन साबूदाने के गड्ढो में पानी डालते रहते हैं, इसकी वजह से इसमें सफेद रंग के कीट पैदा हो जाते हैं। यह सड़ने का, कीड़े-मकोड़े गिरने का और सफेद कीट पैदा होने का कार्य 5-6 महीनों तक चलता रहता है। फिर मशीनों से इस कीड़े-मकोड़े युक्त गुदे को छोटा-छोटा गोल आकार देकर इसे पॉलिश किया जाता है।
      आप लोगों की बातों में आकर साबूदाने को शुद्ध ना समझें। साबूदाना बनाने का यह तरीका सौ प्रतीशत सत्य है। इस वजह से बहुत से लोगों ने साबूदाना खाना छोड़ दिया है। जब आपको साबूदाना का सत्य पता चल गया है, तो इसे खाकर अपना जीवन दूषित ना करें।
कृपया इस पोस्ट को समस्त सधर्मी बंधुओं के साथ शेयर करके उनका व्रत और त्यौहार अशुद्ध होने से बचाए।
               स्वदेशी अपनाये
                   देश बचाए 

Sunday, 7 August 2016

बोतल में दुध पिलाना बच्चो के लिए कितना फायदेमंद है ?

प्लास्टिक के सिप्पी कप से बढ़ रहा बच्चो में कैंसर ! तो आज ही घर से बाहर फेंक दे
 
नई दिल्ली : कभी जूस तो कभी सॉफ्ट ड्रिंक को सिप्पी कप के सहारे गटकने की आदत बच्चों को जल्द जवां बना रही है। पर्यावरण शोध और सलाहकार संगठन टॉक्सिक्स लिंक के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बच्चों के लिए बाजार में उपलब्ध सिप्पी कप सुरक्षित नहीं हैं। इन कप को खतरनाक बना रहा है इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बिसफिनोल-ए (बीपीए) रसायन। यह रसायन हार्मोन सिस्टम पर असर डालकर बच्चों के विकास को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव से जहां लड़कियों में मासिकधर्म शुरू होने की उम्र में कमी हो रही है, वहीं लड़कों में यौवन का विकास जल्द हो रहा है।
 
टॉक्सिक्स लिंक के वरिष्ठ प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर पीयूष महापात्रा ने बताया कि इस अध्ययन में दिल्ली के विभिन्न बाजारों से सिप्पी कप के 13 नमूने एकत्र किए गए। इनकी जांच दिल्ली के श्रीराम औद्योगिक शोध संस्थान (एसआइआइआर) से कराई गई। रिपोर्ट में सामने आया कि 13 में से 10 नमूनों में बीपीए है। यानी 77 फीसद नमूनों में बिसफिनोल -ए है। सिप्पी कप में बीपीए की मात्रा 14.9 पीपीएम (पार्ट प्रति मिलियन) के उच्च स्तर तक है, जोकि बेहद हानिकारक है। हैरानी की बात तो यह है कि इन उत्पादों को बाजार में बीपीए मुक्त का लेबल लगाकर बेचा जा रहा है। उपभोक्ताओं के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे वे सुनिश्चित कर सकें कि कौन सा सिप्पी कप उनके बच्चे के लिए सुरक्षित है।
टॉक्सिक्स लिंक के सह निदेशक सतीश सिन्हा कहते हैं कि कई देश सिप्पी कप के हानिकारक प्रभाव को देखते हुए उन्हें चरणबद्ध तरीके से खत्म कर चुके हैं। लेकिन भारत में यह नवजात बच्चों के दूध की बोतल में इस्तेमाल होने वाले निपल में तो प्रतिबंधित है, लेकिन सिप्पी कपों के निर्माण में इनके प्रयोग पर सरकार खामोश है। सिप्पी कप को उत्पादन, आपूर्ति और वितरण विनियमन अधिनियम 1992 के तहत लाया जाना जरूरी है। टॉक्सिक्स लिंक के निदेशक रवि अग्रवाल कहते हैं कि उत्पादों में इस तरह से रसायनों के इस्तेमाल को लेकर व्यापक नीति व मानक निर्धारित करने की जरूरत है।
क्या है बिसफिनोल-ए
बिसफिनोल-ए (बीपीए) ऐसा रसायन है जो अंत:स्राव में गड़बड़ी करता है। शिशुओं के हार्मोन में गड़बड़ी करने के अलावा बीपीए तीन साल तक की लड़कियों के व्यवहार और भावनात्मक पहलुओं पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। लड़कों की बात करें तो इसके दुष्प्रभाव से उनमें अवसाद व चिंता का भाव बढ़ता है। बीपीए सामान्य तौर पर शरीर में हृदय रोग, यकृत में विषाक्तता और मधुमेह का कारण बनता है। प्लास्टिक उत्पाद सिप्पी कप के निर्माण में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है, जोकि बच्चों के लिए हानिकारक है।
गर्भपात की आशंका अधिक
अमेरिकन सोसायटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (एएसआरएम) ने पाया है कि जिन महिलाओं के खून में बीपीए की मात्रा अधिक होती है, उनमें गर्भपात की आशंका उन महिलाओं की तुलना में अधिक होती है जिनके खून में बीपीए का स्तर निम्नतम है।
व्यवहार पर डालता है असर
244 माताओं पर किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि जन्म से पहले बीपीए से जुड़ा जोखिम तीन साल की उम्र में लड़कियों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है

जाने ब्लड ग्रुप के बारे मे ।

 

     आप सब जानते है कि रक्त कोई फेक्ट्री या लेब में नही बनता । रक्त कि जरुरत पड़ने पर हमे रक्त बेंक से ही रक्त लेना पडता है । इसके लिए हर तीन महीने के बाद रक्त दान करे । आप को इस बात का पता होना चाहिए कि आप का रक्त किस ग्रुप का है ,और किस ग्रुप का रक्त आप ले सकते है ,औैर किसे आप रक्त दे सकते है ।
टाइप -1: A+
      आप किसी A+, AB+,के लिए खून दे सकते हैं।
 आप किसी A+,A-,O+,O-,का रक्त प्राप्त कर सकते हैं। 
टाइप -2: O+
       आप O+, A+, B+, AB+ ,के लिए खून दे सकते हैं।
       आप किसी O+,O-,का रक्त प्राप्त कर सकते हैं।
टाइप -3: B+
      आप किसी  B+,AB+, के लिए खून दे सकते हैं।
        आप B+,B-,O+,O-, का रक्त प्राप्त कर सकते हैं।
टाइप-4: AB+
      आप AB+ ,के लिए खून दे सकता है।
       आप सब लोग से खून प्राप्त कर सकते हैं
टाइप-5: A-
       आप किसी A+,A-,AB+,AB-,को रक्त दे सकते हैं।
   आप A-,O-,से रक्त प्राप्त कर सकते हैं।
प्रकार -6; O-
     आप हर किसी को खून दे सकता है।
     आप O-,से रक्त प्राप्त कर सकते हैं।
टाइप -7: B-
       आप B+,B-,AB+,AB-,को खून दे सकता है
       आप B-,O-,से रक्त प्राप्त कर सकते है।
टाइप -8: AB-
      आपAB+,AB-, को रक्त दे सकते हैं।
       आप AB-,A-,B-,O-,से रक्त प्राप्त कर सकते हैं